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हिमाचल हाईकोर्ट का अहम फैसला: बिना उचित कारण पति से अलग रहना और बच्चों से संपर्क तोड़ना मानसिक क्रूरता

हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट की तलाक की डिक्री को बरकरार रखा

बिना न्यायसंगत कारण अलग रहने और बच्चों से दूरी को माना मानसिक क्रूरता

पत्नी की अपील खारिज, 2019 से अलग रह रहे थे पति-पत्नी


शिमला। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक वैवाहिक विवाद में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि किसी वैध या न्यायसंगत कारण के बिना वैवाहिक घर छोड़कर लंबे समय तक पति से अलग रहना और अपने बच्चों से भी संपर्क नहीं रखना, मामले के तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर मानसिक क्रूरता का आधार बन सकता है। न्यायमूर्ति अजय मोहन गोयल और न्यायमूर्ति योगेश जसवाल की खंडपीठ ने फैमिली कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें पति को क्रूरता और परित्याग के आधार पर तलाक की डिक्री दी गई थी। हाईकोर्ट ने पत्नी की अपील खारिज कर दी। यह फैसला संबंधित मामले के तथ्यों और रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों के आधार पर दिया गया है। भारतीय न्यायिक दृष्टिकोण में मानसिक क्रूरता का आकलन भी प्रत्येक मामले की परिस्थितियों, पक्षकारों के आचरण और उसके प्रभाव को देखते हुए किया जाता है।

2007 में हुआ था विवाह, दो बच्चे हैं

मामले के अनुसार, दोनों पक्षों का विवाह 21 जून 2007 को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था। शादी के बाद पति-पत्नी करीब 10 साल तक साथ रहे। इस दौरान उनके दो बच्चे हुए, जिनमें एक बेटा और एक बेटी शामिल हैं।

विवाह के बाद संबंधों में विवाद बढ़ा और अंततः दोनों अलग रहने लगे। रिकॉर्ड के अनुसार, दोनों पक्ष सितंबर 2019 से अलग रह रहे थे। पति की ओर से फैमिली कोर्ट में क्रूरता और परित्याग के आधार पर तलाक की मांग की गई थी।

पति ने लगाए थे गंभीर आरोप

पति का आरोप था कि शादी के कुछ समय बाद पत्नी के व्यवहार में बदलाव आया। उसके अनुसार, पत्नी कई बार बिना बताए मायके चली जाती थी और उसे तथा परिवार के सदस्यों को झूठे मामलों में फंसाने की धमकियां देती थी।

पति की ओर से यह भी कहा गया कि पत्नी के वैवाहिक घर छोड़ने के बाद उसने अपने बच्चों से मिलने की कोशिश नहीं की और न ही उनसे फोन पर बातचीत की। पति के अनुसार, लंबे समय तक बच्चों से संपर्क नहीं रखना भी वैवाहिक संबंधों पर गंभीर प्रभाव डालने वाला व्यवहार था।

पत्नी ने दहेज उत्पीड़न और मारपीट का आरोप लगाया

दूसरी ओर, पत्नी ने अदालत में अपने बचाव में आरोप लगाया कि उसे दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया और उसके साथ मारपीट की गई। पत्नी का कहना था कि इन्हीं परिस्थितियों के कारण उसे अपना वैवाहिक घर छोड़ना पड़ा।

मामले में हाईकोर्ट के समक्ष दोनों पक्षों की दलीलों और रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों की समीक्षा की गई। अदालत ने मामले के तथ्यों के आधार पर फैमिली कोर्ट के निष्कर्षों में हस्तक्षेप करने का आधार नहीं पाया।

सितंबर 2019 से अलग रह रहे थे पति-पत्नी

खंडपीठ ने रिकॉर्ड का हवाला देते हुए कहा कि दोनों पक्ष सितंबर 2019 से अलग रह रहे थे और उनके बीच वैवाहिक संबंध प्रभावी रूप से समाप्त हो चुके थे। अदालत के अनुसार, मामले में यह भी सामने आया कि पत्नी ने बिना किसी न्यायसंगत कारण के अपना वैवाहिक घर छोड़ा था।

अदालत ने बच्चों से दूरी के पहलू को भी महत्वपूर्ण माना। फैसले में कहा गया कि अपने ही बच्चों से संपर्क बनाए रखने का प्रयास नहीं करना और उनसे बातचीत तक नहीं करना, मामले के समग्र तथ्यों में पति और उसके परिवार के प्रति गंभीर मानसिक क्रूरता को दर्शाता है।

तलाक की फैमिली कोर्ट की डिक्री बरकरार

फैमिली कोर्ट ने पहले पति के पक्ष में क्रूरता और परित्याग के आधार पर तलाक की डिक्री पारित की थी। पत्नी ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

खंडपीठ ने मामले की समीक्षा के बाद फैमिली कोर्ट के फैसले को सही ठहराया और पत्नी की अपील को खारिज कर दिया। इस तरह फैमिली कोर्ट की ओर से दी गई तलाक की डिक्री बरकरार रही।

मानसिक क्रूरता का फैसला हर मामले के तथ्यों पर निर्भर

कानूनी तौर पर मानसिक क्रूरता की कोई एक ऐसी सूची नहीं है, जिसमें हर परिस्थिति को स्वतः क्रूरता माना जाए। अदालतें आमतौर पर पक्षकारों के व्यवहार, परिस्थितियों, अलग रहने की अवधि, उपलब्ध साक्ष्यों और उस आचरण के वैवाहिक जीवन पर प्रभाव को समग्र रूप से देखती हैं। सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों में भी यह स्पष्ट किया गया है कि किसी व्यवहार को मानसिक क्रूरता मानने का निर्धारण मामले के विशिष्ट तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर किया जाना चाहिए।

इस मामले में भी हाईकोर्ट का निष्कर्ष इसी विशेष वैवाहिक विवाद के रिकॉर्ड और परिस्थितियों पर आधारित है। इसलिए फैसले को हर ऐसे मामले में पति-पत्नी के अलग रहने पर स्वतः लागू होने वाला नियम नहीं माना जा सकता।

बच्चों से संपर्क का पहलू भी रहा महत्वपूर्ण

इस मामले में अदालत के सामने केवल पति-पत्नी के बीच लंबे समय से चला आ रहा विवाद ही नहीं था, बल्कि दो बच्चों से संपर्क बनाए रखने का सवाल भी रिकॉर्ड में महत्वपूर्ण रूप से सामने आया। हाईकोर्ट ने पत्नी के लंबे समय तक बच्चों से संपर्क नहीं रखने के तथ्य को वैवाहिक विवाद के समग्र संदर्भ में देखा।

अदालत के फैसले के बाद यह मामला वैवाहिक विवादों में परित्याग, मानसिक क्रूरता और बच्चों के साथ अभिभावकीय संबंध के महत्व को लेकर चर्चा में आया है। हालांकि, प्रत्येक वैवाहिक विवाद में अदालत का निष्कर्ष अलग-अलग तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर तय होता है।